Wednesday, May 4, 2016

And Language Should Never Be a Barrier Any More


अब तक यह कैसे संभव रहा की हिंदी में जैसे कुछ लिखा ही नहीं?
सोलह साल? एक और दो नहीं, पुरे सोलह साल हो गए, और हिंदी के प्रयोग की आवष्यकता ही नहीं हुई. सच ऐसा होता है क्या की हिंदी में सोचते हैं, हिन्दी को बोलते हैं, हिंदी को पहनते हैं....
ना हिन्दू को नहीं, हिंदी को, 
परन्तु हिंदी को लिखा नहीं?

अंग्रेजी में बोलना, लिखना, पढ़ना, सब आसानी से होता रहा तो ज़रुरत ही नहीं हुई हिंदी की. फिर? 
फिर, बच्चों को हिंदी बोलते देखने की इच्छा जागी, क्यों ? 

क्योंकि जब अपने जैसे दीखते बच्चे अपने मुहावरो की सुन्दरता को नहीं सराह पाते, जब हमारे जैसे नामों वाले छोटे छोटे चेहरों पर हिंदी तरानों से जुड़े हिंदी के बोल नहीं आ पाते, और जब 'जूठन' शंब्द के लिए इन बच्चों पे कोई शब्द ही नहीं होता---अंग्रेजी में शब्द नहीं है, और हिंदी इन्हे आती नहीं, तब एहसास होता है की हम हिंदी से जानकार माता -पिता के पास एक कितनी सुन्दर धरोहर है, जो हम इन छोटे छोटे अंतर्राष्ट्रीय नागरिकों को दे सकते हैं. 

मेरे पास हिंदी है, और मैं इन्हे हिंदी दूँगी. यदि तुम्हारे पास मराठी है तो तुम उन्हें वो दो. भाषा---जितनी जानेंगे हम, मेरा यह विश्वास है, की हम उतना जान पाएंगे अपनी जड़ों को, और औरों के नज़रियों को, उनकी विचार धारा को. 

मुझे अंग्रेजी में ही अभी कितना सीखना है. मात्र अंग्रेजी के शब्द-कोष को जान लेने से ही मैं कहाँ मेरे अमरीकी साथियों से आसानी से घुल मिल पाई हूँ? इस देश में हूँ, पर इस देश की नहीं हूँ. और यूं बटा हुआ रहना मानो कटा हुआ रहना है. कुछ तड़पन के साथ रहना है.  

कहते हैं सुख और दुःख की एक भाषा है पूरे विश्व में. इतना साधारण नहीं है सत्य। भाषा वो समझ आती है जिसके रहस्यों को जान लिया गया है. मुस्कराहट को खिखिलाने से अलग पहचाना जाए, आँसूओ की नमि को रोने से भिन्न माना जाए. 

एक उम्र निकल जाएगी हमें उन्हें समझने में, 
हम कोशिश कर रहे हैं, वह बस इतना समझ लें!

हिंदी, अंग्रेजी, स्पेनिश, जो भी भाषा जान के, जितने नजरिोयों के संग हम कुछ दूूर चल सकेंगे उतना हम जान पाएंगे की कुछ खोने पे दुःख सबको होता है, कुछ पाने पे ख़ुशी भी स्वाभाविक है.... हर व्यक्ति के लिए....चाहे वह कितना ही भिन्न दीखता हो हम से.